| ز سوز عشق من جانت بسوزد | همه پیدا و پنهانت بسوزد | |
| ز آه سرد و سوز دل حذر کن | که اینت بفسرد وانت بسوزد | |
| مبر نیرنگ و دستان پیش آن کو | به صد نیرنگ و دستانت بسوزد | |
| به دست خویشتن شمعی میفروز | که هر ساعت شبستانت بسوزد | |
| چه داری آتشی در زیر دامان | کز آن آتش گریبانت بسوزد | |
| دل اندر وصل من بستی و ترسم | که ناگه تاب هجرانت بسوزد | |
| ندارد سودت آن گاهی که گوئی | عبید آن نامسلمانت بسوزد |